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केसी त्यागी के बयानों से असहज जेडीयू, पार्टी लाइन से हटकर बोलना बना सिरदर्द

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बिहार की राजनीति में बयान अक्सर रणनीति होते हैं, लेकिन जब वही बयान पार्टी की सोच से टकराने लगें तो संकट खड़ा हो जाता है। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) इन दिनों इसी स्थिति से गुजर रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह समर्थन नहीं बल्कि संगठन के भीतर बढ़ती नाराजगी है।
जेडीयू नेतृत्व ने अब साफ कर दिया है कि केसी त्यागी के हालिया बयान उनके निजी विचार हैं, जिनका पार्टी के आधिकारिक स्टैंड से कोई संबंध नहीं है। पार्टी सूत्रों की मानें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत शीर्ष नेतृत्व उनके बयानों से नाखुश है और आने वाले समय में संगठनात्मक कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा।
दरअसल, समस्या यह नहीं है कि केसी त्यागी क्या बोल रहे हैं, बल्कि यह है कि वे ऐसे मुद्दों पर बयान दे रहे हैं, जिन पर जेडीयू चुप रहना या संतुलित रुख अपनाना चाहती है। आईपीएल में बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिजुर रहमान को लेकर दिया गया बयान हो या फिर नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग—हर बार पार्टी को सार्वजनिक रूप से सफाई देनी पड़ी।
सूत्रों के मुताबिक, केसी त्यागी ने कई अवसरों पर बिना पार्टी नेतृत्व से परामर्श किए बयान दिए, जिससे संगठन असहज स्थिति में आ गया। खासकर उस वक्त, जब बांग्लादेश में हिंदुओं पर कथित अत्याचार को लेकर देशभर में भावनात्मक माहौल था, त्यागी का बयान पार्टी लाइन के विपरीत माना गया।
संवेदनशील मुद्दों पर बयान बना विवाद की जड़
जेडीयू के भीतर यह स्पष्ट सोच उभरकर सामने आई है कि खेल, आईपीएल या अंतरराष्ट्रीय मामलों जैसे संवेदनशील विषयों पर केवल अधिकृत नेता ही पार्टी की ओर से बोलें। पार्टी का मानना है कि गैर-जरूरी बयानबाजी से न केवल राजनीतिक संदेश कमजोर पड़ता है, बल्कि गठबंधन संतुलन भी प्रभावित होता है।
पुराने विवादों की परछाईं
यह पहला मौका नहीं है जब केसी त्यागी के बयान जेडीयू के लिए परेशानी बने हों। राष्ट्रीय प्रवक्ता रहते हुए फिलिस्तीन मुद्दे पर विपक्षी दलों के साथ मंच साझा करना और बयान देना पहले भी विवाद का कारण बना था। उस समय इसे गठबंधन धर्म के खिलाफ मानते हुए जेडीयू ने उन्हें प्रवक्ता पद से हटा दिया था।
हालांकि पद से हटने के बाद भी बयानबाजी नहीं रुकी। पार्टी सूत्रों का कहना है कि बार-बार ऐसे बयान संगठन के अनुशासन पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
भारत रत्न की मांग: डैमेज कंट्रोल या नई बहस?
हाल ही में केसी त्यागी द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भारत रत्न देने की मांग और प्रधानमंत्री को लिखा गया पत्र भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना। इसे कई लोग उनके पुराने विवादित बयानों के बाद डैमेज कंट्रोल की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि जेडीयू ने इस मांग से खुद को पूरी तरह अलग कर लिया है।
पार्टी का आधिकारिक रुख
जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने स्पष्ट किया कि केसी त्यागी के बयान पार्टी की विचारधारा या नीति को नहीं दर्शाते। उन्होंने कहा कि त्यागी के बयान व्यक्तिगत क्षमता में दिए गए हैं। यह बयान इस ओर इशारा करता है कि पार्टी अब संगठनात्मक रूप से त्यागी की भूमिका पर पुनर्विचार कर रही है।
पार्टी के भीतर यह सवाल तेज हो गया है कि केसी त्यागी की मौजूदा भूमिका क्या है और पार्टी अनुशासन की सीमा कहां तक है। सूत्रों का कहना है कि यदि बयानबाजी का यह सिलसिला जारी रहा, तो जेडीयू कोई सख्त राजनीतिक फैसला ले सकती है।
केसी त्यागी का मामला अब सिर्फ एक नेता के बयान तक सीमित नहीं रहा। यह जेडीयू के लिए अनुशासन, गठबंधन राजनीति और विश्वसनीय राजनीतिक संदेश का सवाल बन चुका है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि पार्टी इस असहजता को नजरअंदाज करती है या फिर निर्णायक कदम उठाती है।

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